Headlines

क्यों करती हैं माताएं जिवित पुत्रिका व्रत…?

क्यों करती हैं माताएं जिवित पुत्रिका व्रत…?
प्रभाकर कुमार
जीवित पुत्रिका व्रत या जिउतिया व्रत कथा, पूजा विधि एवं महत्व 
हमारे देश में भक्ति एवं उपासना का एक रूप उपवास है, जो मनुष्य में संयम, त्याग, प्रेम एवं श्रध्दा की भावना को बढ़ाते हैं। उन्ही में से एक हैं जीवित पुत्रिका व्रत। यह व्रत संतान की मंगल कामना के लिए किया जाता है। यह व्रत माताएं रखती हैं। जीवित पुत्रिका व्रत निर्जला किया जाता है जिसमें पूरा दिन एवं रात पानी नहीं लिया जाता।इसे तीन दिन तक मनाया जाता है। संतान की सुरक्षा के लिए इस व्रत को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। पौराणिक समय से इसकी प्रथा चली आ रही है।
कब किया जाता है जीवित पुत्रिका व्रत?
हिन्दू पंचाग के अनुसार यह व्रत आश्विन माह कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तक मनाया जाता है। इस निर्जला व्रत को माताएं अपनी संतान की सुरक्षा के लिए करती है। भारत में यह व्रत विशेषकर उत्तरप्रदेश, बिहार आदि राज्यों के साथ-साथ पड़ोसी देश नेपाल में भी मनाया जाता है। इस वर्ष 2017 में यह व्रत बुधवार यानी 13 सितम्बर को मनाया जा रहा है। अष्टमी तिथि की शुरूआत 13 सितम्बर को 01:01 बजे से लेकर 22:48 बजे तक है।
जीवित पुत्रिका व्रत पूजा विधि  
यह व्रत तीन दिन किया जाता है, तीनों दिन व्रत की विधि अलग-अलग होती है —
नहाय-खाय : यह दिन  जीवित पुत्रिका व्रत का पहला दिन कहलाता है। इस दिन से व्रत शुरू होता है। इस दिन महिलाएं नहाने के बाद एक बार भोजन लेती हैं। फिर दिन भर कुछ नहीं खातीं।
खर जिउतिया : यह जीवित पुत्रिका व्रत का दूसरा दिन खर जिउतिया  होता है। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत करती हैं। यह दिन विशेष होता हैं।
पारण : यह जीवित पुत्रिका व्रत का अंतिम दिन पारण होता है। इस दिन कई लोग बहुत-सी चीज़े खाते हैं। लेकिन खासतौर पर इस दिन झोर भात, नोनी का साग एवं मड़ुआ की रोटी दिन के पहले भोजन में लिया जाता है। इस प्रकार जीवित पुत्रिका व्रत का यह तीन दिवसीय उपवास किया जाता है।
जीवित पुत्रिका व्रत का महत्व
कहा जाता है कि एक बार एक जंगल में चील और लोमड़ी घूम रहे थे, तभी उन्होंने मनुष्यों को इस व्रत को विधि पूर्वक करते देखा एवं उसकी कथा सुनी। उस समय चील ने इस व्रत को बहुत ही श्रद्धा के साथ ध्यानपूर्वक देखा, वहीं लोमड़ी का ध्यान इस ओर बहुत कम था। चील के संतानों एवं उनकी संतानों को कभी कोई हानि नहीं पहुंची लेकिन लोमड़ी की संतान जीवित नहीं बची। इस प्रकार इस व्रत का महत्व बहुत अधिक बताया जाता हैं।
जीवित पुत्रिका व्रत कथा
यह कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई है। महाभारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्वत्थामा बहुत ही नाराज़ था और उसके अन्दर बदले की आग तीव्र थी। इस कारण उसने पांडवों के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगों को पांडव समझकर मार डाला था, लेकिन वे सभी द्रौपदी की पांच संतानें थी। उसके इस अपराध के कारण उसे अर्जुन ने बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली। इसके फलस्वरूप अश्वत्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया। उसे निष्फल करना नामुमकिन था। उत्तरा की संतान का जन्म लेना आवश्यक था। जिस कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया। गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम जीवित पुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्षित बना। तब से ही इस व्रत को किया जाता है। इस जीवित पुत्रिका व्रत का महत्व महाभारत काल से ही चला आ रहा है।