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मंडोला विहार योजना से प्रभावित किसानों का धरना रहा जारी ।

मंडोला विहार योजना से प्रभावित किसानों का धरना  रहा जारी ।

लोनी गाजियाबाद 8 मार्च 2018 स्टार न्यूज़ टुडे
मंडोला समेत 6 गांव के किसान 2 दिसम्बर 2016 से अपनी अधिग्रहित जमीन के उचित मुआवजे की मांग को लेकर धरने प्रदर्शन करते आ रहे हैं जिला प्रशासनिक अधिकारी व आवास विकास के अधिकारी जनप्रतिनिधियो के साथ मिली भगत करके आवास विकास परिषद की ही पैरवी करते नजर आ रहे हैं किसानों के हित मे कोई भी कदम नही उठाया गया है।
मंडोला किसान आंदोलन की गूंज प्रदेश भर में होने के बावजूद भी आवास विकास परिषद अधिकारी,जिला प्रशासनिक अधिकारी,व जन प्रतिनिधि किसानों के मुद्दे हल कराने के प्रयास व पीड़ित किसानों के साथ सहानुभूति प्रकट करने के बजाय पीड़ित किसानों को अपमानित करने व किसानों के आक्रोश को बढ़ाने में ही लगे हुए हैं । 13/2/18 को आवास विकास कार्यालय पर मंडल कमिश्नर की अध्यक्षता में किसान प्रतिनिधियों की वार्ता हुई जो केवल और केवल 20 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे किसानों का अनशन खुलवाने के लिए ही प्रशासनिक अधिकारियों की छलिया वार्ता साबित हुई ।
किसान 16 महीनों से आंदोलनरत हैं और आवास विकास परिषद के अधिकारी भी कई बार समाचार पत्रों के माध्यम से अपने बयान देकर बता चुके हैं कि प्रभावित किसानों के धरने पर बैठने के कारण मंडोला विहार योजना विवादित हो गई है योजना विवादित होने के कारण आवंटियों ने अपने फ्लैट या भूखंड वापिस कर दिए हैं जिससे परिषद का बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है एक तरफ तो प्रशासन व परिषद योजना को विवादित मानकर  किसानों के मुद्दे शासन स्तर पर हल कराने की बात कर रहे हैं दूसरी तरफ विवाद को बढ़ावा देने के प्रयास भी निरंतर किये जा रहे हैं जिसकी बानगी मिट्टी खनन की अनुमति किसानों को 6% भूखंड जो पूर्व में अनुमोदित किये गए उनमे मिट्टी डालने का हवाला देकर दी गई है  जबकि पूर्व में किये गए किसी भी प्रस्ताव या अनुमोदन को किसान असंवैधानिक करार देकर अस्वीकार कर चुके हैं और 16 महीनों से गैरकानूनी तरीके से किये गए अधिग्रहण का विरोध करते आ रहे हैं     किसानों को अधिग्रहण अधिनियम की आपात काल की धारा 7/17  जो कि 2008 में लागू की गई उसका भय दिखाकर जो असंवैधानिक तरीके से जबरन करार कराए गए थे जिसके तहत किसान की 90% जमीन का 1100 रु प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा व 10% जमीन में से 6%  विकसित भूखंड देने का अनुमोदन तत्कालीन मंडल कमिश्नर द्वारा किया गया जिससे किसान संतुष्ट नही थे और भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले 2009 और 2010 में किसानों ने सरकार के एकतरफा फैसले का विरोध किया जो 18 महीनों तक धरने प्रदर्शन के रूप में चला उस समय के तत्कालीन उप जिलाधिकारी महेंद्र प्रसाद आज आवास विकास परिषद के संयुक्त आयुक्त के पद पर विराजमान हैं जो कि पूर्व में किये गए किसानों के विरोध से अनजान नही हैं 18 महीने तक चले आंदोलन के दबाव में शासन द्वारा मंडल कमिश्नर को मुआवजे का पुनः निर्धारण करने के आदेश दिए ।तत्कालीन अधिकारियों ने आदेश के मुताबिक बढ़े मुआवजे को बाद में दिए जाने की बात कहकर किसानों के साथ धोखा किया जिसको लेकर किसान 2016 में लामबंद हुए और किसान नेता मनवीर तेवतिया के नेतृत्व में किसान सत्याग्रह आंदोलन प्रारम्भ किया । लगातार शासन प्रशासन की तरफ से शांति पूर्वक चल रहे किसान आंदोलन को समाप्त करने के लिए लगातार प्रयास किए गए किसान नेताओ समेत सेकड़ो किसानों पर मुकदमे दर्ज किए गए किसानों ,किसान नेताओ को जिला बदर किया गया व किसान व किसान महिलाओ ने लाठीचार्ज का  सामना भी किया दर्जनों किसान घायल भी हुए थे । शासन प्रशासन की दोहरी नीति से किसानों में  असमंजस की स्थिति बनी हुई है किसानों में शासन प्रशासन व जनप्रतिनिधियो के प्रति आक्रोश बढ़ना भी स्वभाविक है क्योकि किसान खुद को ठगा सा मान रहे है।
आज किसानों के धरने पर सैकड़ो किसान महिला व पुरुष उपस्थित रहे।