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यूपी :अंबेडकर की आड मे दलितो के बिश्वास को  जीतने का कुचक्र या खेल ? 

यूपी :अंबेडकर की आड मे दलितो के बिश्वास को  जीतने का कुचक्र या खेल ? 
स्टार न्यूज टुडे (त्वरित टिप्पणी)
राकेश पाण्डेय
यूपी – भला हो मान्यवर कांशीराम का, अगर वे दलितों को राजनीतिक ताक़त नहीं बनाते तो आज भी कोई अंबेडकर का नाम लेने वाला न होता।
जैसे-जैसे दलित आंबेडकर के सबसे बड़े योगदान आरक्षण की वजह से सशक्त हुए हैं वैसे-वैसे अंबेडकर का मोल बढ़ा है, इसलिए नहीं कि वे महान थे, महान तो वे थे ही, लेकिन मोल इसलिए बढ़ा कि उन्हें महान मानने वालों का विश्वास जीतना अब राजनीतिक मजबूरी बन चुकी है।
कांग्रेस ने दलितों और ब्राह्मणों को लंबे समय तक एक साथ साध लिया था, मुसलमान भी उसे अपनी पार्टी मानते थे और गांधी की विरासत बेचकर दशकों तक काम चल गया, अंबेडकर की ज़रूरत ही नहीं पड़ी, साठ-सत्तर के दशक में बड़ी हुई पीढ़ी ने अंबेडकर का नाम शायद ही कभी सुना क्योंकि तब तक कोई कांशीराम नहीं था दलितों को ये नहीं समझाने के लिए कि तुम्हारे वोट की क़ीमत उतनी ही है जितनी किसी ज़मींदार या पुजारी की।डॉक्टर बीआर अंबेडकर अन्याय के भयावह अंधकार के ख़िलाफ़ एकाकी संघर्ष का नाम है, उनका मर्म न तो गांधीवादियों ने समझा, न वामपंथियों ने, न किसी और ने ।अंबेडकर ने दलितों के दमन-शोषण और अत्याचार की सामाजिक स्वीकृति, उसे हिंदू धर्म की वर्णाश्रम व्यवस्था से मिलने वाली वैधता पर तीख़े सवाल उठाए।
इसी अन्याय को ज़्यादातर लोग संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था और धर्म मानते रहे थे, इसे ईसा मसीह की पैदाइश से पहले कभी गौतम बुद्ध ने चुनौती दी थी, बीच-बीच में कबीर, रैदास, बाबा फ़रीद, नानक जैसे अनेक संत बताते रहे कि ये जात-पात फर्जी हैं, फिर आए अंबेडकर जिन्होंने वेद-पुराणों का गहन अध्ययन करने के बाद, इन्हीं बातों को तर्कों और तथ्यों की नई धार दी।
अंबेडकर और गांधी के बीच अलग दलित इलेक्टोरेट के सवाल पर जो टकराव था उसके बारे में पढ़ना आँखें खोलने वाला है कि डॉक्टर अंबेडकर और गांधी की सोच कितनी अलग थी, अलग इलेक्टोरेट के मामले में गांधी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया और दबाव में अंबेडकर को 1932 में पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करना पड़ा।
अंबेडकर चाहते थे कि संसद में दलितों के नुमाइंदे चुनने के लिए केवल दलित वोट डालें और चुने गए लोग दलितों के मुद्दों को आगे बढ़ाएँ लेकिन पूना पैक्ट में इसे खारिज कर दिया गया। पैक्ट के तहत दलितों के लिए सीटें रिज़र्व हो गईं जहाँ गैर-दलित चुनाव नहीं लड़ सकते थे लेकिन वोटर सामान्य थे, अंबेडकर का मानना था कि ऐसे सांसद प्रभावी नहीं होंगे और आगे चलकर ये सही साबित हुआ।इसकी मिसाल भाजपा के सांसद छोटेलाल खैरवार हैं जिन्होंने साफ़ शब्दों में कहा है–“मुख्यमंत्री मुझे डाँटकर भगा देते हैं, सांसद हुआ तो क्या हो गया, रहूँगा तो दलित ही.”
कांग्रेस अक्सर कहती थी कि वह दलितों की हितैषी है इसलिए उसने एक दलित व्यक्ति डॉ केआर नारायणन को राष्ट्रपति बनवाया है।
अब बीजेपी रामनाथ कोविंद के बारे में यही दावा करती है, मगर ये एहसान करने की अदा दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं है जिसे अंगरेज़ी में ‘टोकनइज़्म’ कहा जाता है।गांधी सवर्ण हिंदुओं के जिस हृदय परिवर्तन की बात करते थे, वो अभी तक नहीं हो पाया है। अमित शाह के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी में एक भी राष्ट्रीय स्तर का पदाधिकारी दलित नहीं है जबकि पार्टी के अपने संविधान के तहत अनुसूचित जाति के कम-से-कम तीन लोग पदाधिकारी होने चाहिए।
बात बस इतनी-सी है कि अंबेडकर की कौन कितनी इज्जत कौन करता है, इसका फैसला भी दलित ही करेंगे जिनके अंबेडकर हैं, मूर्तियों पर माला चढ़ाना तो सबकी मजबूरी है।