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“इंक़लाब ज़िंदाबाद” के नारे ने मौलाना हसरत मोहानी को अमर बना दिया

“इंक़लाब ज़िंदाबाद” के नारे ने मौलाना हसरत मोहानी को अमर बना दिया
फ़ैसल रहमानी
 यौम-ए-वफ़ात पर स्पेशल रिपोर्ट
“इंक़लाब ज़िंदाबाद” का नारा सुनते ही हर हिंदुस्तानी जोश से भर जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह ख़ूबसूरत और जोशीला नारा किसने दिया था? हुब्बुल वतनी यानी देश प्रेम से लबरेज़ यह नारा दिया था – मौलाना हसरत मोहानी ने।
आज हसरत मोहानी की यौम-ए-वफ़ात (पुण्यतिथि) है। यूपी के उन्नाव ज़िले के मोहान गांव में 1 जनवरी 1875 को जन्मे मोहानी साहब जितने बड़े पत्रकार और शायर थे, उससे कहीं बड़े वो जंग-ए-आज़ादी के सिपाही थे। आज़ादी की लड़ाई में वह तक़रीबन एक दर्जन बार जेल भी गये। छात्र जीवन में ही आंदोलन के दौरान वे कालेज़ से निकाले भी गए।
1921 में कांग्रेस के एक सम्मेलन में मोहानी साहब ने “इंक़लाब ज़िंदाबाद” का नारा पेश किया, जो हर आज़ादी के मतवालों का रूहानी नारा बन गया। बाद में इस नारे ने क्रांतिकारियों को बहुत ताकत दी। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान ने इस नारे को ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बग़ावत के एलान के तौर पर इस्तेमाल किया। इस तरह यह नारा आज़ादी की अलामत बना। 8 अप्रैल 1929 के असेंबली बम कांड के दौरान भगत सिंह द्वारा “इंक़लाब ज़िन्दाबाद” का नारा लगाने के बाद, यह दुनिया का सबसे चर्चित और असरदार नारों में शुमार हुआ। यह नारा मशहूर शायर हसरत मोहानी ने एक जलसे में, आज़ादी-ए-कामिल (पूर्ण आज़ादी) की बात करते हुए दिया था। इस नारे ने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की सरगर्मियों को और ख़ास तौर से अशफ़ाक़ुल्लाह  ख़ान, भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद की हौसला अफज़ाई की। उन्होंने और उनके जैसे कई क्रांतिकारियों ने आज़ादी के लिए अपनी जान दे दी। चंद्रशेखर आज़ाद ने अंग्रेज़ों से घिरे होने के बावजूद ख़ुद से मौत को गले लगा लिया। आज़ादी के लिए जद्दोजहद के दौरान हर किसी की आवाज़ बन चुका था – इंक़लाब ज़िंदाबाद।
 
कुछ लोग यह समझते हैं कि यह नारा भगत सिंह ने दिया था। लेकिन ऐसा नहीं है। उर्दू ज़ुबान के शायर “हसरत मोहानी” इस नारे के असली ख़ालिक़ (जन्मदाता) हैं। यह नारा उन्हीं की क़लम से 1921 में लिखा गया था। जिसे 1929 में भगत सिंह ने पहली बार आवाज़ दी थी। यह इसी तरह की बात है कि “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है…” रामप्रसाद बिस्मिल ने लिखा। अक्सर लोग इसे रामप्रसाद बिस्मिल की रचना बताते हैं, लेकिन हक़ीक़त में इन क्रांतिकारी पंक्तियों को अज़ीमाबाद (अब पटना) के शायर “बिस्मिल अज़ीमाबादी” ने लिखा है। इसे गाते हुए रामप्रसाद बिस्मिल हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए और ख़ुद के साथ इस ग़ज़ल को भी अमर कर दिया। यह ग़ज़ल इतनी मशहूर हुई कि काकोरी के इंक़लाबियों के लिए आज़ादी का तराना बन गई। और तब से अब तक इंक़लाबी बदलते रहे, पर पंक्तियां वही रहीं।
“इंक़लाब ज़िंदाबाद” की तर्ज़ पर नारा पहली बार Mexican Revolution के वक़्त Viva la Revolution के नाम से शुरू हुआ। जिसका मक़सद था लोगों में बेदारी पैदा करना। जिससे कि वो सरकार के ज़ुल्मो-ओ-सितम के ख़िलाफ़ लड़ सकें। Mexican Revolution के इस नारे का असर इतना ज़्यादा हुआ था कि कई दूसरे मुल्कों में भी इस तरह नारों का इस्तेमाल अपने-अपने ढंग से होने लगा। तहरीक-ए-आज़ादी के दौरान हिंदुस्तान में भी इस तरह का पुरजोश नारा “इंक़लाब ज़िंदाबाद” दिया गया। यह नारा आज भी लोगों की ज़ुबान पर रहता है।
उत्तर प्रदेश के मोहान (शहर उन्नाव) में जन्मे हसरत मोहानी का असली नाम सैयद फ़ज़ल-उल-हसन था। वह बहुत मेहनती स्टूडेंट थे। तस्लीम लखनवी और नसीम देहलवी की शागिर्दी उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ही में मिल गई, जहां उन्होंने शायरी में महारत हासिल कर ली। उनकी शायरी आज के ज़माने में भी बहुत मशहूर और म’आरूफ़ है। कुल्लियात-ए-हसरत मोहानी में उनका सारा ही कलाम मिल जाता है। उनकी ग़ज़ल ‘चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है, हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है……’ हर ख़ास-ओ-आम के दिलों में बसी हुई है।
उन्होंने शायरी के लिए जैसा इंक़लाबी काम किया, कुछ वैसा ही इंक़लाब उन्होंने सियासत में भी लाने की कोशिश की। हिन्दुस्तान की आज़ादी के सबसे मशहूर नारों में से एक “इंक़लाब ज़िंदाबाद” का नारा हसरत मोहानी की ही देन है। उन्होंने यह नारा 1921 में दिया, जिसे बाद में शहीद भगत सिंह ने तहरीक-के-आज़ादी के दौरान बहुत ही पुरजोश अंदाज़ में इस्तेमाल किया। वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के फाउंडर मेंबर भी थे। उनकी मृत्यु 76 वर्ष की उम्र में 13 मई 1951 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में हुई।
आज़ादी के बाद भी इस नारे की प्रासंगिकता बानी हुई है। पहले ये नारा अंग्रेज़ो को भगाने के लिए रूहानी ताकत देता था, आज़ादी के बाद लोकतंत्र में ये सत्ता पक्ष की निरंकुशता के ख़िलाफ़ विपक्ष की आवाज़ बना जो अभी भी कायम है। जब तक भारत देश रहेगा, इंक़लाब ज़िन्दाबाद का नारा भी रहेगा, और इसी के साथ हसरत मोहानी भी अमर रहेंगे।