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इफ्तार किट : गरीबों की सहायता या परेशानी ? 

इफ्तार किट : गरीबों की सहायता या परेशानी ? 
अब्दुल ख़ालिक़ कासमी
मदरसा तैयबा मिन्नतनगर, माधोपुर, मुजफ्फरपुर
 रमजान मुबारक का पवित्र महीना अपनी तमाम रहमतों, बरकतों, नेमतों, नवाजिशों के साथ चल रहा है। इस मुबारक महीने में हर मुसलमान अपनी क्षमता और शक्ति के अनुसार, जहां अपने दस्तरखानों को फैला देता है वहीं कुछ लोग जिन्हें अल्लाह दौलतों से नवाज़ा है मुसलमानों के गरीब, जरूरतमंद, विधवा, लावारिशों की मदद करते हैं, और अल्लाह की नेमतों से अपने झोली को भरते हैं, उनमें से कुछ दानवीर ऐसे होते हैं जो इस मुबारक महीने के आते ही बड़े जोश से भर जाते हैं और वह खूब बढ़चढ़ जरूरतमंदों की मदद करने में हिस्सा लेते हैं। और इस तरह करते हैं कि किसी को पता भी नहीं चलता, ऐसे ही लोग अल्लाह के नजदीक इनाम के हक़दार हैं।
 वास्तव में समकालीन समय में रमजान किट वितरण के नाम पर विभिन्न सामाजिक संगठनों और संस्थाओं द्वारा स्टेज सजाकर किया जाने वाला नाटक मुसलमानों के लिए एक त्रासदी चिंतनीय विषय है, कुछ अहले सरवत हज़रात भी अपनी प्रतिष्ठा और वाहवाही लूटने के लिए रमजान पैकेज बनाते हैं, जिसके तहत पूरे माह का राशन, इफ्तार के सामान और अन्य चीजें उपलब्ध कराई जाती हैं। जब हम इन चीजों को बांटने के लिए मुसलमानों के गरीब जरूरतमंद स्त्री व पुरुष , बूढ़े-बुढ़ीयों को पंक्ति में खड़ा करते हैं, वह भी ऐसे समय में जब सख्त चिलचिलाती हुई धूप यूं तो ऐसा महसूस कराती है कि मुस्लिम समुदाय के गरीबों के साथ एक हास्यपद खेल खेला जा रहा है। बहुत सारी मां-बहनें अपने बच्चों की खातिर अपनी इज़्ज़त व आबरू की परवाह किए बिना पंक्ति में खड़ी अपनी बारी का इंतजार करती नजर आती हैं, क्या इस तरह से रमज़ान किट लोगों में बांटने की व्यवस्था उचित है? मैं पंक्ति में ऐसे ऐसे लोगों को खड़ा देखा है, जिनमें चलने की शक्ति नहीं वह अपने लड़खड़ाते पैर पर खड़े हैं, इस उम्म के मालदारों की हया कहाँ खो गई ? उनके अंदर से इज्जत व एहतराम और दूसरों के आत्मसम्मान को बचाये रखने की भावना क्यों शून्य हो गया ? क्या यह नबी का फरमान भूल गए कि इस तरह दो कि बाएँ हाथ भी खबर न हो कि दाहिने हाथ ने क्या दिया है ? आज मुसलमानों की कितनी ही मां-बहनें हैं जो अपने बच्चों की खातिर दर-दर की ठोकरें खाकर कुछ टकों के लिए मालदारों के घरों चक्कर काट रही हैं। कभी दरवाजे से दुत्कारी जाती हैं कभी उनका अपमान और उपहास उड़ाया जाता है। उन्हें पंक्ति में लगाकर रमजान किट के साथ उनके तस्वीरों को अखबारों में विज्ञापन की तरह इस्तेमाल किया जाता है, रमजान किट देते हुए उन बेकसों की एक भीड़ एकत्रित करके तस्वीरें लेना, उन्हें दिए जाने वाले रमजान किट और अन्य वस्तुओं पर किसी निर्धारित संस्था का स्टीकर या मुहर लगाकर दुनिया को यह बतलाना कि यह लोग ज़कात व खैरात पर पल रहे हैं, कितनी गलत हरकत है ! आप विश्वास करें कि ये लोग दान-पुण्य नहीं कर रहे हैं बल्कि इस उम्मत की मां और बहनों के सम्मान और मर्यादा का खून कर रहे हैं। किसी गरीब की गरीबी को अपनी इज़्ज़त व प्रतिष्ठा और वाहवाही लूटने का स्रोत बनाकर उसे रमज़ान किट देना अच्छा कार्य बिल्कुल नही कहला सकता। अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम का फरमान है कि जो अपने लिए पसंद करो वही दूसरों के लिए भी पसंद करो। अगर हम अपने व्यवहार का गंभीरता से आत्मनिरीक्षण करे तो कितने लोग हैं जो नबी इस फरमान पर खरे उतरते हैं ? इसलिए इस मुबारक व मुक़द्दस महीने में गरीबों की मदद करते हुए खुदा के वास्ते दर्द के मारे मुसलमानों की इज्जत-प्रतिष्ठा का भी ख्याल रखें। आपकी जितनी क्षमता है उतनी ही मदद कीजिये लेकिन किसी गरीब का मजाक तो न बनाइये। अल्लाह हमें सही रास्तों पर चलने की तौफ़ीक़ अता फरमाएं – आमीन