Headlines

नहीं रहे GAYA के जगजीवन कॉलेज के साबिक़ प्रिंसिपल प्रो. शौकत अली। इतवार को अदा की जाएगी आख़िरी रुसूमात।

नहीं रहे GAYA के जगजीवन कॉलेज के साबिक़ प्रिंसिपल प्रो. शौकत अली। इतवार को अदा की जाएगी आख़िरी रुसूमात।
GAYA (Faisal Rahmani / Star News Today) :
हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।
बिहार के गया ज़िले के मशहूर व माअ’रूफ़ शख़्सियतों में से एक प्रो. शौकत अली नहीं रहे। पिछले 14 जुलाई को उन्होंने अपने ज़िन्दगी के 70 साल पूरे किए थे। सबको यक़ीन था कि वो जल्द-अज़-जल्द सेहतयाब होकर घर वापस हो जाएंगे। लेकिन अल्लाह को ये मंज़ूर न था। उन्होंने मंगलोर के एक हॉस्पिटल में आख़िरी सांस ली। उनकी नमाज़-ए-जनाज़ा इतवार को बाद नमाज़ ज़ोहर आबगिला मस्जिद में अदा की जाएगी। उसके बाद उन्हें आबगिला क़ब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा। वो लंग्स कैंसर के मर्ज़ में मुब्तिला थे।
प्रो. शौकत अली शहर के जगजीवन कॉलेज के प्रिंसिपल होकर रिटायर हुए थे। कॉलेज पर एक ख़ास ज़ात का बोलबाला था। वहां का माहौल बहुत ख़राब था। वह कॉलेज कम झगड़े-फ़साद की जगह ज़्यादा बना हुआ था। जब वह प्रिंसिपल बने तो उनके सामने एडमिनिस्ट्रेटिव बदलाव एक चैलेंज था। उन्होंने एक ऐसे कॉलेज को रास्ते पर लाया जिसका सही रास्ते पर लाना मुमकिन नहीं लग रहा था। मगर अपनी सलाहियत से प्रो. शौक़त ने यह कर दिखाया। उनके इन्तेज़ामी महारत का लोहा आज भी लोग मानते हैं। यही वजह रही कि रिटायरमेंट के बाद भी कॉलेज के तक़रीबात में उन्हें काफ़ी इज़्ज़त-ओ-एहतेराम मिलता रहा। अपनी पेशेवर ज़िन्दगी के बाद उन्होंने अपनी ज़िंदगी समाज की ख़िदमत के लिए वक़्फ़ कर दिया था। उनकी सियासी पकड़ भी काफ़ी अच्छी थी। प्रो. शौकत अली इस्लामी थिंकर और मुसन्निफ़ मौलाना सैयद रेयासत अली नदवी के साहबज़ादे थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू भी उनकी बहुत क़द्र किया करते थे।
प्रो. शौक़त अली बहुत सारी ख़ूबियों के मालिक थे। वो सियासतदां, क़ौम-परस्त, सामाजिक, हिंदू-मुस्लिम एकता के अलमबरदार थे। वो गया और ख़ासकर आबगिला का एक ऐसा चेहरा थे जो मज़हब, ज़ात-पात, अमीर-ग़रीब जैसे बंधनों से आज़ाद था। 1994 में वीपी सिंह की पार्टी जनता दल से नीतीश कुमार निकल गए थे। जॉर्ज फ़र्नान्डिस व नीतीश कुमार ने मिलकर समता पार्टी क़ायम की थी। प्रो. शौकत अली समता पार्टी के बानी मेम्बरान में से एक थे। लालू का बिहार में दबदबा था। उनके मुस्लिम-यादव मुसावात ने बिहार में मुसलमानों के बीच उनकी पकड़ मज़बूत कर दी थी। ऐसे में समता पार्टी को एक बड़े मुस्लिम चेहरे की ज़रूरत थी। समाजवादियों के ग्रुप से शौक़त अली जुड़ गए। वह भी तब, जब लालू मुसलमानों के मसीहा बन बैठे थे। प्रो. शौकत अली ने ही गया में समता पार्टी के बैनर तले मुस्लिम दानिशवरों की पहली नशिश्त कराई थी। उसमें जॉर्ज व नीतीश समेत कई दूसरे बड़े नेता भी शामिल हुए थे। बाद में क़ायमशुद जनता दल (यूनाइटेड) के वो बानी मेम्बरान में से एक थे।
बाद में उनके एकलौते साहबज़ादे शारिम अली ने भी सियासत में क़दम रखा। उन्होंने अपनी दुआओं का हाथ शारिम अली की पीठ पर रखा और वो भी आगे बढ़ते गए। वो भी नीतीश कुमार की जदयू के साथ जुड़ गए। लेकिन नीतीश-मांझी मनमुटाव की वजह कर जीतनराम मांझी ने हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) नाम से पार्टी बनाई। शारिम अली जदयू के दामन छोड़ कर मांझी की नाव में सवार हो गए। उन्हें बिहार स्टेट सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के एडमिनिस्ट्रेटर की कुर्सी मिली। बाद में उन्होंने एमएलए और एमएलसी के इंतेख़ाबात भी लड़ा। हालांकि इसमें उन्हें कामयाबी तो नहीं मिली लेकिन एक सियासतदां के तौर पर अपनी पहचान बनाने में कामयाबी मिली। बाद में शारिम अली ने जनता दल हिंदुस्तानी नाम से अपनी पार्टी बनाई तो प्रो. शौकत अली की सरपरस्ती उन्हें हासिल हुई।
शारिम अली पर अपने वालिद प्रो. शौकत अली के ख़्वाबों को हक़ीक़त का जामा पहनाने का दबाव रहेगा। उनपर दबाव रहेगा कुछ बन कर दिखाने का। सियासत में अपनी एक अलग छाप छोड़ने का। शारिम अली अपनी पार्टी जनता दल हिंदुस्तानी को बुलंदतरीन मुक़ाम पर ले जाएं, यही बेटे की तरफ से मरहूम को सच्ची ख़िराज-ए-अक़ीदत होगी।