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तुम मुझे यूं भुला न पाओगे………….!

तुम मुझे यूं भुला न पाओगे………….!
फ़ैसल रहमानी
मोहम्मद रफ़ी साहब के पुण्यतिथि पर विशेष
(24 दिसंबर 1924 – 31 जुलाई 1980)
                         संगीतकार नौशाद अक्सर मोहम्मद रफ़ी साहब के बारे में एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाते थे। एक बार एक अपराधी को फांसी दी जी रही थी। उससे उसकी अंतिम इच्छा पूछी गई तो उसने न तो अपने परिवार से मिलने की इच्छा प्रकट की और न ही किसी ख़ास खाने की फ़रमाईश। उसकी सिर्फ़ एक इच्छा थी जिसे सुन कर जेल कर्मचारी सन्न रह गए। उसने कहा कि वो मरने से पहले रफ़ी साहब का बैजू बावरा फ़िल्म का गाना “ओ दुनिया के रखवाले….” सुनना चाहता है। इस पर एक टेप रिकॉर्डर लाया गया और उसके लिए वह गाना बजाया गया। क्या आप को पता है कि इस गाने के लिए मोहम्मद रफ़ी साहब ने 15 दिन तक रियाज़ किया था और रिकॉर्डिंग के बाद उनकी आवाज़ इस हद तक टूट गई थी कि कुछ लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि रफ़ी साहब शायद कभी अपनी आवाज़ वापस नहीं पा सकेंगे। लेकिन रफ़ी साहब ने लोगों को ग़लत साबित किया और भारत के सबसे लोकप्रिय पार्श्वगायक बने।
            चार फ़रवरी 1980 को श्रीलंका के स्वतंत्रता दिवस पर मोहम्मद रफ़ी साहब को श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में एक शो के लिए आमंत्रित किया गया था। उस दिन उनको सुनने के लिए 12 लाख कोलंबोवासी जमा हुए थे, जो उस समय का विश्वरिकॉर्ड था। श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति जेआर जयवर्धने और तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रेमदासा उद्घाटन के तुरंत बाद किसी और कार्यक्रम में भाग लेने जाने वाले थे। लेकिन रफ़ी साहब के ज़बर्दस्त गायन ने उन्हें रुकने पर मजबूर कर दिया और वह कार्यक्रम ख़त्म होने तक वहां से हिले नहीं। मोहम्मद रफ़ी की बहू और उनपर एक किताब लिखने वाली यास्मीन ख़ालिद रफ़ी कहती हैं कि रफ़ी साहब की आदत थी कि जब वह विदेश के किसी शो में जाते थे तो वहां की भाषा में एक गीत ज़रूर सुनाते थे। उस दिन कोलंबो में भी उन्होंने सिंहली भाषा में एक गीत सुनाया।.लेकिन जैसे ही उन्होंने हिंदी गाने सुनाने शुरू किया भीड़ बेकाबू हो गई और ताज्जुब की बात है कि ऐसा तब हुआ जब भीड़ में शायद ही कोई हिंदी समझता था।
रफ़ी साहब के तरकश में सभी तीर
                 अगर एक गीत में इज़हार-ए-इश्क़ की एक सौ एक विधाएं दर्शानी हों तो आप सिर्फ़ एक ही गायक पर अपना पैसा लगा सकते हैं और वह हैं मोहम्मद रफ़ी साहब। चाहे वो किशोर प्रेम का अल्हड़पन हो, दिल टूटने की व्यथा हो, परिपक्व प्रेम के उद्गार हों, प्रेमिका से प्रणय निवेदन हो या सिर्फ़ उसके हुस्न की तारीफ़… मोहम्मद रफ़ी साहब का कोई सानी नहीं था। प्रेम को छोड़ भी दीजिए तो मानवीय भावनाओं के जितने भी पहलू हो सकते हैं – दुख, ख़ुशी, आस्था या देशभक्ति या फिर गायकी का कोई भी रूप हो भजन, क़व्वाली, लोकगीत, शास्त्रीय संगीत या ग़ज़ल, मोहम्मद रफ़ी साहब के तरकश में सभी तीर मौजूद थे।
रेज ऑफ़ द नेशन
                  रफ़ी साहब को पहला ब्रेक दिया था श्याम सुंदर ने पंजाबी फ़िल्म ‘गुलबलोच’ में। मुंबई की उनकी पहली फ़िल्म थी ‘गांव की गोरी’। नौशाद और हुस्नलाल- भगतराम ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उस ज़माने में शर्माजी के नाम से मशहूर आज के ख़य्याम ने फ़िल्म ‘बीवी’ में उनसे गीत गवाए। ख़य्याम के शब्दों में, “1949 में मेरी उनके साथ पहली ग़जल रिकॉर्ड हुई जिसे वली साहब ने लिखा था, “अकेले में वह घबराते तो होंगे, मिटाके वह मुझको पछताते तो होंगे…”. रफ़ी साहब की आवाज़ के क्या कहने! जिस तरह मैंने चाहा उन्होंने उसे वैसा ही गाया। जब ये फ़िल्म रिलीज़ हुई तो ये गाना रेज ऑफ़ द नेशन हो गया।”
                मोहम्मद रफ़ी साहब के करियर का सबसे बेहतरीन वक़्त था 1956 से 1965 तक का समय। इस बीच उन्होंने कुल छह फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीते और रेडियो सीलोन से प्रसारित होने वाले बिनाका गीत माला में दो दशकों तक छाए रहे। रफ़ी साहब के करियर की रफ़्तार कुछ दिनों के लिए कम हो गई थी 1969 में जब ‘आराधना’ फ़िल्म रिलीज़ हुई। राजेश खन्ना की आभा ने पूरे भारत को चकाचौंध कर दिया और आरडी बर्मन ने बड़े संगीतकार बनने की तरफ़ अपना पहला बड़ा क़दम बढ़ाया। इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया के पूर्व सह-संपादक राजू भारतन कहते हैं, “आराधना के सभी गाने पहले रफ़ी साहब  ही गाने वाले थे। अगर एसडी बर्मन बीमार नहीं पड़ते और आरडी बर्मन ने उनका काम नहीं संभाला होता तो किशोर कुमार सामने आते ही नहीं और वैसे भी ‘आराधना’ के पहले दो डुएट रफ़ी साहब ने ही गाए थे।” भारतन बताते हैं, “पंचम ने बहुत पहले स्पष्ट कर दिया था कि अगर उन्हें मौक़ा मिला तो वो रफ़ी साहब की जगह किशोर को लाएंगे।”
“जहाँ तक रफ़ी की लोकप्रियता में गिरावट की बात है, उसके कुछ कारण थे। जिन अभिनेताओं जैसे दिलीप कुमार, धर्मेंद्र, जीतेंद्र संजीव कुमार के लिए रफ़ी साहब गा रहे थे, वे पुराने पड़ गए थे और उनकी जगह नए अभिनेता ले रहे थे और उनको नई आवाज़ की ज़रूरत थी। आरडी बर्मन जैसे संगीतकार उभर कर सामने आ रहे थे और उन्हें कुछ नया करके दिखाना था।”
रफ़ी साहब की दरियादिली
                    सत्तर के दशक की शुरुआत में संगीतकारों ने मोहम्मद रफ़ी साहब का साथ छोड़ना शुरू कर दिया था, सिवाए लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के। लक्ष्मीकांत तो अब रहे नहीं, लेकिन प्यारेलाल ज़रूर हैं जो कहते हैं कि उन्होंने रफ़ी साहब का नहीं, बल्कि रफ़ी साहब ने उनका साथ नहीं छोड़ा। जानेमाने ब्रॉडकास्टर अमीन सयानी मोहम्मद रफ़ी साहब और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के बारे में एक दिलचस्प कहानी सुनाते हैं। सयानी कहते हैं, “एक बार लक्ष्मीकांत ने मुझे बताया कि जब वो पहली बार रफ़ी साहब के पास गाना रिकॉर्ड कराने के लिए गए जो उन्होंने उनसे कहा कि हम लोग नए हैं इसलिए हमें कोई प्रोड्यूसर बहुत ज़्यादा पैसे भी नहीं देगा। हमने आपके लिए एक गाना बनाया है। अगर आप इसे कम पैसों में गा दें तो बहुत मेहरबानी होगी। रफ़ी साहब ने धुन सुनी। उन्हें बहुत पसंद आई और वह उसे गाने के लिए तैयार हो गए। रिकॉर्डिंग के बाद वह रफ़ी साहब के पास थोड़े पैसे ले कर गए रफ़ी साहब ने पैसे यह कहते हुए वापस लौटा दिए कि यह पैसे तुम आपस में बांट लो और इसी तरह बांट कर खाते रहो। लक्ष्मीकांत ने मुझे बताया कि उस दिन के बाद से उन्होंने रफ़ी साहब की वह बात हमेशा याद रखी और हमेशा बांट कर खाया।”
स्टाइलिश घड़ियों और कारों के शौकीन
                        रफ़ी साहब बहुत कम बोलने वाले, ज़रूरत से ज़्यादा विनम्र और मीठे इंसान थे। उनकी बहू यास्मीन ख़ुर्शीद बताती हैं कि न तो वह शराब या सिगरेट पीते थे और न ही पान खाते थे। बॉलीवुड की पार्टियों में भी जाने का उन्हें कोई शौक़ नहीं था। घर पर वह सिर्फ़ धोती-कुर्ता ही पहनते थे लेकिन जब रिकॉर्डिंग पर जाते थे तो हमेशा सफ़ेद क़मीज़ और पतलून पहना करते थे। उनको स्टाइलिश घड़ियों और फ़ैंसी कारों का बहुत शौक़ था। लंदन की कारों के रंगों से वो बहुत प्रभावित रहते थे इसलिए एक बार उन्होंने अपनी फ़िएट कार को तोते के रंग में हरा रंगवा दिया था। उन्होंने एक बार मज़ाक़ भी किया था कि वह अपनी कार को इस तरह से सजाते हैं जैसे दशहरे में बैल को सजाया जाता है.
लंदन सिर्फ़ खाना खाने गए
                  रफ़ी साहब कभी-कभी पतंग भी उड़ाते थे और अक्सर उनके पड़ोसी मन्ना डे उनकी पतंग काट दिया करते थे। वह बहुत अच्छे मेहमान नवाज़ भी थे। दावतें देने का उन्हें बहुत शौक था। उनके नज़दीकी दोस्त ख़य्याम बताते हैं कि रफ़ी साहब ने कई बार उन्हें और उनकी पत्नी जगजीत कौर को साथ खाने पर बुलाया था और उनके यहां का खाना बहुत उम्दा हुआ करता था। यास्मीन ख़ालिद बताती हैं कि एक बार वो ब्रिटेन में कॉवेंट्री में शो कर रहे थे। जब वो अपने पति ख़ालिद के साथ उनसे मिलने गई तो वह थोड़े ख़राब मूड में थे क्योंकि उन्हें वहां ढंग का खाना नहीं मिल पा रहा था। उन्होंने पूछा कि यहां से लंदन जाने में कितना समय लगेगा। ख़ुर्शीद ने जवाब दिया यही कोई तीन घंटे। फिर वो यास्मीन की तरफ़ मुड़े और पूछा क्या तुम एक घंटे में दाल, चावल और चटनी बना सकती हो? यास्मीन ने जब हाँ कहा तो रफ़ी साहब बोले, “चलो लंदन चलते हैं। किसी को बताने की ज़रूरत नहीं हैं। हम सात बजे शो शुरू होने से पहले वापस कॉवेंट्री लौट आएंगे।” रफ़ी साहब, ख़ालिद और यास्मीन बिना किसी को बताए लंदन गए। यास्मीन ने उनके लिए झटपट दाल, चावल और चटनी और प्याज़-टमाटर का सलाद बनाया। रफ़ी साहब ने खाना खाकर यास्मीन को बहुत दुआएं दी और ऐसा लगा जैसे किसी बच्चे को उसकी पसंद का खिलौना मिल गया हो। जब उन्होंने कावेंट्री लौट कर आयोजकों को बताया कि वह सिर्फ़ खाना खाने लंदन गए थे तो वे आश्चर्यचकित रह गए।
बॉक्सर मोहम्मद अली से मुलाक़ात
                        रफ़ी साहब को बॉक्सिंग के मुक़ाबले देखने का बहुत शौक था और मोहम्मद अली उनके पसंदीदा बॉक्सर थे। 1977 में जब वह एक शो के सिलसिले में शिकागो गए तो आयोजकों को रफ़ी साहब के इस शौक़ के बारे में पता चला। उन्होंने रफ़ी साहब और मोहम्मद अली की एक मुलाक़ात कराने की कोशिश की। लेकिन यह इतना आसान काम भी नहीं था। लेकिन जब अली को बताया गया कि रफ़ी साहब भी गायक के रूप में उतने ही मशहूर हैं जितना कि वह एक बॉक्सर के रूप में हैं, तो अली उनसे मिलने के लिए तैयार हो गए। दोनों की मुलाक़ात हुई और रफ़ी साहब ने बॉक्सिंग पोज़ में मोहम्मद अली के साथ तस्वीर खिंचवाई।
पद्मश्री से कहीं ऊंचे सम्मान के हक़दार
        राजू भारतन से यह पूछने पर कि क्या रफ़ी को उनके जीवित रहते वह सम्मान मिल पाया जिसके कि वह हक़दार थे? भारतन का जवाब था, “शायद नहीं लेकिन रफ़ी साहब ने सम्मान पाने के लिए कभी लॉबिंग नहीं की। ये देखकर कि उन्हें मात्र पद्मश्री ही मिल सका, मैं मानता हूँ कि उन्हें अपना हक़ नहीं मिला। उन्हें इससे कहीं ज़्यादा मिलना चाहिए था।”
“1967 में जब उन्हें पद्मश्री मिला तो उन्होंने कुछ समय तक सोचा कि इसे अस्वीकार कर दें, लेकिन फिर उनको सलाह दी गई कि आप एक ख़ास समुदाय से आते हैं और अगर आप ऐसा करते हैं तो आपको ग़लत समझा जाएगा। उन्होंने इस सलाह को मान लिया लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।”
                 बहरहाल, आज रफ़ी साहब हमारे बीच नहीं हैं. उनके गुज़रे 38 साल हो गए, लेकिन आज भी उनके गीतों को सुनकर हमारे कानों में मधुरता घुलती रहती है। कितने गायकों के घर उनके गानों पर स्टेज शो कर करके चलते हैं। आज भी कई नामचीन या नवोदित गायकों ने तो रफ़ी साहब के गानों को गा-गा कर अपना एक मुक़ाम बना लिया है।
रफ़ी साहब को मिले भारत रत्न
                         रफ़ी साहब जैसे कलाकार और इंसान सदियों में एक बार जन्म लेते हैं। रफ़ी साहब के चाहने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। रफ़ी साहब के फ़ैंस देश में ही नहीं बल्कि दुनिया के हर कोने में हैं। उन्होंने पूरी दुनिया में भारत को गौरवान्वित किया है। अतः मुहम्मद रफ़ी साहब को भारत रत्न पुरस्कार मिलना ही चाहिए। यह मांग रफ़ी साहब के फ़ैंस की ओर से देश भर में उठाई जा रही है। एक फ़ैन डॉ. असफ़र सईद ने कहा कि इसके लिये फ़ेसबुक, ट्वीटर, व्हाट्स अप जैसे सोशल मीडिया का भी सहारा लिया जा रहा है।