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महान पुस्तक प्रेमी खुदाबख्श की जयंती आज, अपने गौरवशाली अतीत पर आंसू बहा रही है खुदाबख्श लाइब्रेरी

महान पुस्तक प्रेमी खुदाबख्श की जयंती आज, अपने गौरवशाली अतीत पर आंसू बहा रही है खुदाबख्श लाइब्रेरी

अशरफ अस्थानवी

आज महान पुस्तक प्रेमी खुदा बख्श दिवस है। खुदाबख्श लाइब्रेरी के संस्थापक खान बहादूर खुदाबख्श खान आज ही के दिन 2 अगस्त 1842 ईसवी में छपरा जिला के एक गांव में आंखें खुली थी। आज लाइब्रेरी अपने संस्थापक की जयंती ऐसे वातावरण में बना रही है, जब केंद्र की वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार के नाकारात्मक व्यवहार के कारण लाइब्रेरी विगत 4 वर्ष से अपने निदेशक से वंचित है। पुस्तकों की खरीदारी बंद है और लाइब्रेरी तथा  शैक्षणिक एवं शौधिक गतिविधियां ठप पड़ गई है। ऐेसे में आज लाइब्रेरी के संस्थापक की आत्मा कितनी तड़प रही होंगी, बयान नहीं किया जा सकता है।

खुदाबक़्श ओरियेन्टल लाइब्रेरी पटना, भारत के सबसे प्राचीन पुस्तकालयों में से एक और भारत के तीसरे नंबर की लाइब्रेरी है जो बिहार प्रान्त के पटना शहर में स्थित है। वर्ल्ड में रूस की लाइब्रेरी के बाद इस लाइब्रेरी मे तक़रीबन पाँच लाख किताबे मौजूद हैं। मौलवी खुदाबक़्श खान के द्वारा सम्पत्ति एक पुस्तकों के निज़ी दान से शुरु हुआ यह पुस्तकालय देश की बौद्धिक सम्पदाओं में काफी प्रमुख है। भारत सरकार ने संसद में 1969 ई० में पारित एक विधेयक द्वारा इसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के रूप में प्रतिष्ठित किया। यह स्वायत्त शासी पुस्तकालय जिसके अवैतनिक अध्यक्ष बिहार के राज्यपाल होते हैं, पूरी तरह भारत सरकार के संस्कृति मन्त्रालय के अनुदानों से संचालित है। खुदाबक़्श पुस्तकालय की शुरुआत मौलवी मुहम्मद बक़्श जो छपरा के उखाई गाँव के थे उनके निजी पुस्तकों के संग्रह से हुई थी। वे स्वयं कानून और इतिहास के विद्वान थे और पुस्तकों से उन्हें खास लगाव था। वो पेशे से पटना मे वकील थे और उनके पूर्वज मुग़ल बादशाह आलमगीर के सेवा मे थे। उनके निजी पुस्तकालय में लगभग चौदह सौ पांडुलिपियाँ और कुछ दुर्लभ पुस्तकें भी शामिल थीं। 1876 ई० में जब वे अपनी मृत्यु-शैय्या पर थे उन्होंने अपनी पुस्तकों की ज़ायदाद अपने बेटे खुदा बक्श खाँ को सौंपते हुये एक पुस्तकालय खोलने की ईच्छा प्रकट की। इस तरह मौलवी खुदाबक़्श खान को यह सम्पत्ति अपने पिता से विरासत में प्राप्त हुई जिसे उन्होंने लोगों को सम्रपित किया।खुदा बक्श खाँ का जन्म 2 अगस्त 1842 ई० को छपरा मे ही हुआ। अपनी शुरआत की हाई स्कूल की शिक्षा सन 1859 ई० मे अच्छे नंबर के साथ पटना में रह कर पिता के साथ किये। उसके बाद 1868 ई० पटना से कानून की शिक्षा प्राप्त कर 1868 ई० मे पटना नगर निगम के उपाअधियक्ष रहे। उसके बाद 1895 ई० मे हैदराबाद निजाम के उच्चन्यालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप मे नियुक्त हुए थे। खुदाबक़्श ने अपने पिता द्वारा सौंपी गयी पुस्तकों के अलावा और भी पुस्तकों का संग्रह किया तथा 1888 ई० में लगभग अस्सी हजार रुपये की लागत से एक दो मंज़िले भवन में इस पुस्तकालय की शुरुआत की और सन 1891 ई० मे बंगाल के उपराज्यपाल सर चार्ल्स इलियट द्वारा ग्रन्थालय का उद्वघाटन करा उन्हें “खान बहादुर” की उपाधि से समर्पित कर 29 अक्टूबर 1891 ई० को जनता की सेवा में समर्पित किया। उस समय पुस्तकालय के पास अरबी, फारसी और अंग्रेजी की चार हजार दुर्लभ पांडुलिपियाँ मौज़ूद थीं। क़ुरआन की प्राचीन प्रतियां और हिरण की खाल पर लिखी क़ुरानी पृष्ठ भी हैं। इसके अलावा विष पता करने वाली ग्लास तथा अनेको नयाब संग्रह लाइब्रेरी मे आज भी मौजूद है।

 6 नवंम्बर 2005 ई० को पूर्व राष्ट्रपति और विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक मरहूम ‘एपीजे’ अब्दुल कलाम ने जब खुदा बख्श लाइब्रेरी का निरक्षण किया, तो फौरन उसे दिल्ली स्थानंत्रित करने के लिए आदेश दिया था, परंतु उन्हे उनकी हाथ की लिखी किसी किताब से पता चला की, खुदा बक्श खाँ ने खुद ही अपनी ज़िन्दगी मे अपने लाइब्रेरी को प्रदान किया था और नसीहत की थी कि यह मेरे निजी मकान में रहेगी और देश व दुनिया के पुस्तक प्रेमी यहां पधार कर अपने शैक्षणिक प्यास बुझाऐंगे।

 66 वर्ष की उम्र मे 3 अगस्त 1908 ई० को यह महान पुस्तक प्रेमी इस नशवर जगत को सदा सर्वादा के लिये त्याग कर ईश्वर से जा मिले। वसियत के अनुसार इन्हें पुस्तकालय प्रागण मैं ही स्पूर्द-ए-खाक किया गया और इनके निधन से एक युग का अंत हो गया। अब वो हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनके कार्यकलाप हमारे सामने है और जब तक हमलोग पुस्तकालय में अध्ययन करते रहेंगे खुदाबख्श खान हमेशा याद रहेंगे।