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“ट्रेजेडी क्वीन” मीना कुमारी की अदायगी थी बेहद ख़ास।

“ट्रेजेडी क्वीन” मीना कुमारी की अदायगी थी बेहद ख़ास।
 
फ़ैसल रहमानी
 
ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी के 85वें जन्मदिन पर विशेष 
(1अगस्त 1933 – 31 मार्च 1972)
“ट्रेजेडी क्वीन” के नाम से मशहूर अदाकारा और उर्दू की जज़्बाती शायरा मीना कुमारी उर्फ़ माहजबीं बानो परदे पर अपने सहज, सरल अभिनय के अलावा अपनी बिखरी और बेतरतीब निजी ज़िन्दगी के लिए भी जानी जाती है।
भारतीय स्त्री के जीवन के दर्द को रूपहले परदे पर साकार करते-करते कब वे ख़ुद दर्द की मुकम्मल तस्वीर बन गईं, इसका पता शायद उन्हें भी न चला होगा। उनकी भूमिकाओं में विविधता का अभाव ज़रूर रहा, लेकिन अपनी ख़ास अभिनय-शैली और मोहक उनींदी आवाज़ के जादू की बदौलत उन्होंने भारतीय दर्शकों का दिल जीता।
मीना कुमारी का नाम हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के महान कलाकारों में आज भी गिना जाता है। मीना एक अलग तरह की अदाकारा थीं। उनके अभिनय के कारण ही उन्हें उनके इंतेक़ाल के 47 सालों बाद भी याद किया जाता है। बेहद ही कम उम्र में इस दुनिया को छोड़ जाने वाली यह अदाकारा अपनी ज़िंदगी में जितना कामयाब थीं, उतना ही उन्होंने अपनी जिंदगी में दुख भी झेला था। अपनी जिंदगी के ज्यादातर पल दुखों में बिताने के बाद भी उन्होंने कभी भी अपने काम के साथ किसी तरह का कोई समझौता नहीं किया। और एक से बढ़कर एक बेहतरीन फ़िल्मों में काम किया। गूगल ने मीना कुमारी को सम्मान देते हुए एक अगस्त के डूडल उन्हें समर्पित किया है।
एक अगस्त 1932 का दिन था। महाराष्ट्र के दादर ईस्ट, बॉम्बे प्रेसीडेंसी में एक क्लीनिक के बाहर मास्टर अली बख़्श नाम के एक शख़्स बड़ी बेसब्री से अपनी तीसरी औलाद के जन्म का इंतजार कर रहे थे। दो बेटियों के जन्म लेने के बाद वह दुआ कर रहे थे कि अल्लाह इस बार बेटे का मुंह दिखा दे। तभी अंदर से बेटी होने की ख़बर आई तो वह सिर पकड़ कर बैठ गए। मास्टर अली बख़्श ने तय किया कि वह बच्ची को घर नहीं ले जाएंगे और उसे अनाथालय में छोड़ आए। लेकिन बाद में उनकी पत्नी के आंसुओं ने बच्ची को अनाथालय से घर लाने के लिए उन्हें मजबूर कर दिया। बच्ची का चांद सा ख़ूबसूरत चेहरा देखकर उसकी मां ने उसका नाम ‘‘महजबीं’’ रखा। बाद में यही महजबीं फ़िल्म इंडस्ट्री में मीना कुमारी के नाम से मशहूर हुईं।
1939 में बाल कलाकार के रूप में बेबी मीना के नाम से अपना फ़िल्मी सफ़र शुरू करने वाली मीना की नायिका के रूप में पहली फ़िल्म ‘वीर घटोत्कच्छ’ थी। उन्हें मक़बूलियत हासिल हुई विमल राय की फिल्म ‘परिणीता’ से। ‘गोमती के किनारे’ उनकी आख़िरी फ़िल्म थी। 33 साल लम्बे फ़िल्मी करियर में उनकी कुछ मशहूर फ़िल्में हैं – परिणीता, दो बीघा ज़मीन, फ़ुटपाथ, एक ही रास्ता, शारदा, बैजू बावरा, दिल अपना और प्रीत पराई, कोहिनूर, आज़ाद, चार दिल चार राहें, प्यार का सागर, बहू बेगम, मैं चुप रहूंगी, दिल एक मंदिर, आरती, सांझ और सवेरा, चित्रलेखा, साहब बीवी और ग़ुलाम, मंझली दीदी, भींगी रात, नूरज़हां, काजल, फूल और पत्थर, पाकीज़ा और मेरे अपने।
मीना कुमारी अपनी सारी ज़िंदगी इमोशनली घुटती रहीं, सिसकती रहीं। लोगों ने अक्सर उनका फ़ायदा उठाया। अपने स्वार्थ के लिए उनसे इमोशनली अटैच हो गए। लेकिन मतलब पूरा होने के बाद एक झटके में किनारा भी कर लिया। इस तरह के लोगों की अगर लिस्ट बनाई जाए तो बहुत से लोगों के साथ एक नाम धर्मेंद्र का भी आता है। धर्मेंद्र का करियर आगे बढ़ाने में मीना कुमारी का बहुत बड़ा योगदान था, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। यूं मानें कि धरम को फ़िल्म इंडस्ट्री में खड़ा करने की मीना कुमारी की ही कोशिशें थीं तो यह ग़लत नहीं होगा। मीना कुमारी 1964 से 1968 के बीच मीना और धरम की जोड़ी ने कई फिल्मों में काम किया जैसे “मैं भी लडकी हूं”, “पूर्णिमा”, “काजल”, “फूल और पत्थर”, “मंझली दीदी”, “चंदन का पालना”, “बहारों की मंज़िल” वग़ैरह, वग़ैरह। एक साथ काम करने पर इनके रोमांस के चर्चे जग ज़ाहिर हो गए थे। यहां तक कि दिल्ली में एक प्रोग्राम में तत्कालीन राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ख़ुद मीना कुमारी से उनके व धर्मेंद्र के रिश्ते के बारे में पूछ लिया था।
पति कमाल अमरोही ने भी जीवन भर उनका इस्तेमाल किया। मीना कुमारी के जाने के बाद रिलीज़ कमाल अमरोही की ‘पाकीज़ा’ सुपरहिट रही, मगर ट्रेजेडी क्वीन के पास अपने आख़िरी दिनों में अस्पताल का अंतिम बिल चुकाने लायक़ भी पैसे नहीं थे। उनकी बेपनाह भावुकता ने उन्हें नशे की अंधेरी दुनिया में भटकाया, लेकिन अंततः उनकी शायरी ने उन्हें मुक्ति दी। महज़ 38 साल की उम्र में गुज़र जाने वाली इस अभिनेत्री को हम अड़तीस साल लम्बी दर्द की कविता भी कह सकते हैं। उनके मरने के बाद उनके मित्र शायर गुलज़ार ने उनकी सैकड़ों डायरियों से निकाल कर उनका दीवान ‘मीना कुमारी की शायरी’ के नाम से प्रकाशित कराया।
मीना कुमारी के यौम-ए-पैदाईश पर स्टार न्यूज़ टुडे की तरफ़ से खिराज़-ए-अक़ीदत उन्हीं की एक नज़्म के साथ…
 
रात सुनसान है 
तारीक है दिल का आंगन 
आसमां पर कोई तारा 
न जमीं पर जुगनू 
टिमटिमाते हैं मेरी तरसी हुई आंखों में 
कुछ दिये 
तुम जिन्हें देखो तो कहोगे आंसू
 
दफ़’अतन जाग उठी दिल में 
वही प्यास, जिसे 
प्यार की प्यास कहूं मैं तो 
जल उठती है ज़ुबां 
सर्द एहसास की भट्टी में 
सुलगता है बदन 
प्यास, यह प्यास 
इसी तरह मिटेगी शायद 
आए ऐसे में कोई ज़हर ही दे दे मुझको!