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गीतकार-ए-आज़म : शकील बदायूंनी

गीतकार-ए-आज़म : शकील बदायूंनी
 
फ़ैसल रहमानी
 
यौम-ए-पैदाईश (03/08/1916 – 20/04/1970) पर ख़ास पेशकश
 
 
आंखों से दूर सुबह के तारे चले गए,
नींद आई तो ग़म के नज़ारे चले गए।
 
दिल था किसी की याद में मसरूफ़ और हम,
शीशे में ज़िंदगी को उतारे चले गए।
 
अल्लाह रे बेख़ुदी कि हम उनके रू-ब-रू,
बे एख़्तियार उनको पुकारे चले गए।
 
मुश्किल था कुछ तो इश्क़ की बाज़ी का जीतना,
कुछ जीतने के ख़ौफ़ से हारे चले गए।
 
नाकामी-ए-हयात का करते भी क्या गिला,
दो दिन गुज़ारने थे, गुज़ारे चले गए।
 
जलवे कहां जो ज़ौक़-ए-तमाशा नहीं ‘शकील’,
नज़रें चली गईं तो नज़ारे चले गए।
बॉलीवुड के मशहूर गीतकार और शायर शकील बदायूंनी की पैदाईश आज ही के दिन उत्तर प्रदेश के बदायूं में हई थी। शकील बदायूंनी के वालिद मोहम्मद जमाल अहमद सोख़्ता क़ादिरी उनका अच्छा मुस्तक़बिल चाहते थे। उन्होंने इस वजह कर उनको अरबी, उर्दू, फ़ारसी और हिंदी ज़ुबान सिखाई। उनकी शुरुआती तालीम घर पर ही हुई। बचपन से ही उनकी शायरी में काफ़ी दिलचस्पी थी। 1936 में उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी भेजा गया जहां से उन्होंने डिग्री हासिल की। 1940 में उनकी शादी सलमा बेगम से हो गई। उनका अगला सफ़र दिल्ली का था। दिल्ली में एक सरकारी महकमे में सप्लाई ऑफ़िसर की नौकरी की। लेकिन उनके अंदर के शायर को ये सब पसंद नहीं आया। जिगर मुरादाबादी की तरह ग़ज़ल कहना उन दिनों के शायरों में फ़ैशन सा था। शकील भी ‘जिगर’ से बहुत मुतास्सिर थे। उनकी शोहरत का ग्राफ़ भी जिगर की ही तरह ऊपर और ऊपर चढ़ रहा था।
1944 के आस-पास शकील ने मुंबई का रुख किया। यहां उनकी मुलाक़ात उस ज़माने के बड़े प्रोड्यूसर एआर कारदार से हुई जो उन्हें मोसिक़ार नौशाद के पास ले गए। नौशाद ने कहा, “शकील मियां, कुछ लिख सकते हो तो सुना दो।” शकील को तो जैसे इसी बात का इंतेज़ार था। पास रखे काग़ज़ पर कुछ लिखा और नौशाद साहब के आगे कर दिया। नौशाद ने देखा और बेसाख़्ता उनके चेहरे पर एक मुस्कराहट फैल गई।
शकील ने लिखा था –
 
हमदर्द का अफ़साना दुनिया को सुना देंगे
हर दिल में मुहब्बत की एक आग लगा देंगे।
एआर कारदार, नौशाद अली और शकील बदायूंनी के बीच जो कुछ बंध चुका था उसे भांप गए। जैसे ही नौशाद ने उनकी तरफ़ देखा वो समझ चुके थे कि फिल्म ‘दर्द’ का गीतकार उनके सामने खड़ा है। फिर यूं हुआ कि नौशाद-शकील की जोड़ी ने फ़िल्मी मौसिक़ी में एक ऐसी शमा रौशन कर दी जो आज तक जल रही है। ये भी अपने आपमें एक रिकॉर्ड है कि तीन साल तक (1961-63) बेस्ट-लिरिसिस्ट का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड शकील के नाम ही रहा। ये गीत थे फ़िल्म ‘चौदहवीं का चाँद’ (1961) का टाइटल सॉंग “चौदहवीं का चांद हो या आफ़ताब हो….”, फ़िल्म घराना (1962) का “हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं….” और फ़िल्म ‘बीस साल बाद’ (1963) का “कहीं दीप जले कहीं दिल….।”
लेकिन 1952 में जो तवारीख़ शकील बदायूंनी, नौशाद अली और मो. रफ़ी साहब की तिकड़ी ने ‘बैजू-बावरा’ में बना डाला वो नायाब था। तीन मुसलमानों ने मिलकर देश को अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब का वो नायाब तोहफ़ा दिया जिसकी कोई दूसरी मिसाल कभी न पैदा हो सकी। ब्रज भाषा के अल्फ़ाज़, राग मालकौस की बंदिश और ख़ुदा की दी हुई आवाज़, सबने मिलकर वो जादू पैदा कर दिया कि आज 66 बरसों के बाद भी लोग इस भजन को सुनते हैं और भींगी हुई आंखों से इसकी पूजा करते हैं।
इसके बाद शकील और नौशाद ने एक जोड़ी के तौर पर काम करना शुरू कर दिया। शकील गाना लिखा करते थे और नौशाद उन गानों को कंपोज़ किया करते थे। इन दोनों की जोड़ी ने बॉलीवुड की फ़िल्में जिनमें ‘दीदार’, ‘बैजू बावरा’, ‘मदर इंडिया’ और ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के लिए हिट गाने दिए थे। हिंदुस्तान की सरकार ने उनके एज़ाज़ में उन्हें ‘गीतकार-ए-आज़म’ का ख़िताब से नवाज़ा था।
शकील बदायूंनी ने फिल्म ‘दर्द’ से जो सफ़र शुरू किया तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने 26 साल के अपने फ़िल्मी करियर में तक़रीबन 89 फ़िल्मी गीत लिखा। फ़िल्मी गीतों के अलावा उनकी ग़ज़लों को काफ़ी मक़बूलियत नसीब हुई। उनकी ग़ज़लों को बेगम अख़्तर ने गाकर उनको ग़ज़लों को लाफ़ानी बना दिया।
शकील बदायूंनी एक ऐसे गीतकार थे जिनकी शोहरत उस वक़्त किसी बड़े फ़िल्मी स्टार से कम नहीं थी। इस बात का पता एक वाक़ये से चलता है। एक बार की बात है। शकील फ़्रंटियर-मेल से बॉम्बे से दिल्ली जा रहे थे। इस दौरान ट्रेन हर छोटे-बड़े स्टेशन पर रुक रही थी। प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े लोगों का हुजूम ट्रेन की फ़र्स्ट क्लास कोच में काली शेरवानी और सफ़ेद पायजामा पहने शख़्स को ढूंढ निकाले थे जिसने सर के बाल पीछे को संवार रखे थे, जिसकी आंखों में बड़ी ख़ूबसूरत चमक थी और जिसके होंटों पर सदाबहार मुस्कराहट मानो चिपक कर रह गई थी।
ये मंजरनामा उर्दू के जाने-माने अदीब ‘प्रकाश पंडित’ ने अपनी तहरीर में लिखा था। डिब्बे में बैठे दूसरे पैसेंजर ताज्जुबख़ेज़ निगाहों से एक-दूसरे को देख रहे थे, जैसे कह रहे हों, “आखिर ये शख़्स कौन है? न तो कोई जाना-माना नेता है, न बैनल अक़वामी शोहरत याफ़्ता कोई खिलाड़ी, और फिल्म अदाकार तो किसी सूरत में नहीं लगता, फिर इतना प्यार, इतनी अक़ीदत कि कोई फूल दे रहा है तो कोई पान लाया है और कोई मिठाई। वो सबके सलाम और तोहफ़े क़बूल कर रहा है। तभी भीड़ से कोई पुकार उठता है ‘शकील साहब लौटते वक़्त हमारे यहां थोड़ा रुककर जाइएगा’।
ये है शकील बदायूंनी की शोहरत का एक छोटा-सा क़िस्सा। इस शोहरत का राज़ छुपा है उनके तरन्नुम में, शेरों की चुस्ती में, और संजीदगी की शिद्दत में। मुहब्बत की राहों में शकील अपने चाहने वालों को तो संभलने की राय दे रहे हैं लेकिन मोहब्बत और शोहरत में वो ख़ुद ऐसा डगमगा गए कि संभलना मुश्किल हो गया। शकील के नक़िदीन को उनसे इसी बात की शिकायत रही कि ‘वाह-वाह’ और ‘सुबहान अल्लाह’ के लगातार शोर ने उन्हें उसी शायरी तक उन्हें महदूद कर दिया। जिसमें लोगों को वाबिस्ता करने का फ़न था और उन्हें ज़िन्दगी के कई अहम पहलुओं के बारे में सोचने का मौक़ा नहीं दिया। उनके दौर के कई शायर जहां अपनी शायरी में तरक़्क़ीपसन्दी के नए तेवर तलाश रहे थे, वो ‘मुहब्बत’ से ही आंख-मिचौलियां करते रहे।
हो सकता है कि शकील के नक़िदीन की बात में काफ़ी दम हो लेकिन शकील के बारे में यह इकहरी सोच लगती है। अपने जमाने के जाने-माने शायर और ज्ञानपीठ अवार्ड से नवाज़े गए अली सरदार जाफ़री शकील के बारे में कहते हैं, “शकील ग़ज़ल कहना भी जानते हैं और उसे गाना भी। मैं अपनी अदबी ज़िंदगी में शकील से दूर रहा हूं लेकिन उनकी ग़ज़ल से हमेशा क़ुरबत महसूस किया है। ये एक ऐसी लताफ़त है जो दिल में उतर जाती है।”
शकील का अंदाज़-ए-बयां करोड़ों हिंदुस्तानियों के लिए वजह-ए-सुकून था। फ़िल्मी दुनिया में उनके गीत सिर चढ़ कर बोलते थे। हिंदुस्तानी के साथ-साथ, ब्रज और अवधी ज़ुबान में रचे-बसे लोकगीत की रिवायत का भी उन्होंने जमकर इस्तेमाल किया।
2016 में जब शकील के पैदाईश के सौ साल हुए थे तो भारत सरकार ने उनकी याद में एक डाक टिकट भी जारी किया था। उन्हीं दिनों एक अंग्रेज़ी मज़मून ने उनके बारे में लिखा था – “जब यूपी के तवारीख़ी शहर, बदायूं में 3 अगस्त 1916 को एक बच्चे ‘शकील अहमद’ की पैदाइश हुई तो शायद ही किसी को ये अंदाज़ा हुआ होगा कि आज़ाद हिंदुस्तान में ये शहर अपने इस नौनिहाल के नाम से जाना जाएगा। यही नौनिहाल बड़ा होकर हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री का सबसे मशहूर नाम “शकील बदायूंनी” कहलाया।’
इस बीच शोहरत और कामयाबी की इस राह में कब एक जानलेवा बीमारी ने उनका दामन पकड़ लिया, उन्हें पता ही नहीं चला। उन्हें टीबी हो गई थी जो उस ज़माने तक लाइलाज बीमारी थी। 50 की उम्र में ऐसी जानलेवा बीमारी, जिसने सुना, भौंचक्का रह गया। उन्हें पंचगनी में इलाज के लिए ले जाया गया। नौशाद के साथ-साथ कई लोगों को उनकी माली हालात का पता था। कईयों ने मदद के लिए उनकी तरफ़ हाथ बढ़ाया। लेकिन शकील एक ख़ुद्दार इंसान थे। उन्होंने मदद लेने से पूरी तरह इनकार कर दिया। तब नौशाद साहब ने उनकी मदद के लिए दूसरा रास्ता एख़्तेयार किया। उन्होंने प्रोड्यूसरों से अपनी ज़िम्मेदारी पर उन्हें तीन फ़िल्में दिलवाईं और गाने लिखवाने के लिए पंचगनी आते जाते रहे। मेहनताना के तौर पर हर गीत, जो शकील लिया करते थे, उससे दस गुना ज़्यादा फ़ीस में उन गानों के लिए क़रार किया।
इंसानी कोशिशें अपनी जगह, बीमारी ने अपना भयानक शक्ल एख़्तेयार कर लिया था। 20 अप्रैल 1970 को सिर्फ़ 54 साल की उम्र में हिंदुस्तान का ये हरदिल अज़ीज़ शायर और गीतकार हमेशा के लिए हमसे रुख़सत हो गया।