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सुशासन पस्त – अपराधी मस्त (बिहार को है नया मुख्यमंत्री की तलाश)

सुशासन पस्त – अपराधी मस्त (बिहार को है नया मुख्यमंत्री की तलाश)
     —– नजरे आलम
कभी बुद्ध व महावीर की धरती रही बिहार आज हिंसात्मक गतिविधियों की वजह से पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। एडीजी एस.के. सिंघल की रिपोर्ट के अनुसार 2017 में अपहरण के 20096 मामले दर्ज हुए थे जबकि 2018 में यही मामले अपनी तादाद से बढ़कर 21709 हो गए हैं। हत्याओं के मामले जहाँ 2017 में 236 दर्ज हुए थे वहीं 2018 में इसकी संख्या बढ़कर 284 हो गई है। इसी रिपोर्ट के अनुसार बलात्कार की घटनाऐं विगत साल के मुकाबले रिकार्ड 2.5 गुनी हो गई है। एडीजी एस.के. सिंघल की इस रिपोर्ट से बिहार की वास्तविक स्थिति का हल्का सा अंदाजा लगाया जा सकता है। यहाँ पर स्मरणीय तथ्य यह भी है कि पिछले 2 महीनों में जो बिहार में घटा है वो इस रिपोर्ट में दर्ज नहीं है!
सरकार इस रिपोर्ट को लेकर कितना गंभीर है इसका अंदाजा लगाने के लिए यही जुमला काफी है, यहाँ ‘’कानून का राज’’ है और सुशासन बाबु बिहार की कमान अब भी थामे हुए है। यहाँ तो कुछ गलत हो ही नहीं सकता। सत्ता के गठजोड़ और नीतीश बाबु के ’फर्जी कानून के राज’ ने उन्हें यह भी भूलने पर मजबूर कर दिया कि बिहार की वास्तविक स्थिति अच्छी नहीं है। इसका उदाहरण हमें इस तरह मिलता है। एडीजी एस.के. सिंघल जो अपनी रिपोर्ट लिखित में पेश कर चुके थे वो ही एक दिन प्रेस काॅन्फ्रेंस बुलाते हैं और कैमरे के सामने अपनी रिपोर्ट की ही धज्जी उड़ाते हुए नजर आते हैं। सिंघल कहते हैं कि अगस्त 2017 से लेकर जुलाई 2018 के बीच राज्य में 22.23 फीसदी अपराधों में कमी आई है। वह यहीं पर बस नहीं करते आगे कहते हैं जुलाई के मुकाबले अगस्त में अपराधिक घटनाओं में 12.07 फीसदी की गिरावट पाई गई है।
उपर्युक्त आकड़ों को देखकर बेहिचक हँसी फूट पड़ती है। एस.के. सिंघल या तो पहले गलत आंकड़ा अपनी रिपोर्ट में पेश किया या वो अभी प्रेस काॅन्फ्रेंस कर झूट फैला रहे हैं। किसी संवैधानिक पद पर रहकर गलत आंकड़ा पेश करना संविधान के साथ मजाक उड़ाने के बराबर है और यह संगीन अपराध की श्रेणी में भी आता है। पर किया किया जाए सिंघल साहब यह बात भली भांति जानते हैं के वो इस फन के ज्ञाता नहीं बल्कि अनुयायी हैं। देश के साथ साथ अब पूरा विश्व जानता है कि कैमरे के सामने गलत आंकड़ा देना और सफाई के साथ झूट पर झूट बोल जाने का अविष्कार किसने किया? कार्रवाई अगर किसी पर होगी तो सबसे पहले अविष्कारक पर होनी चाहिए। यही वह फन है जो सिंघल को एडीजी होने के बावजूूद पुष्ट करता है झूट बोलो और बेहिचक बोलो।
यकीन मानिए नीतीश कुमार ही पूरे देश में एक ऐसा राजनेता है जो यह जानता है कि किस नेता और किस पदाधिकारी से किस तरह का काम लिया जा सकता है। कभी के.सी. त्यागी को सामने खड़ा कर देता है तो कभी एडीजी सिंघल को। बड़ी खूबी के साथ सारा काम काज हो जाने के बावजूद भी उनकी छवि धुमिल नहीं होने पाती। बिहार अभी अपराध युग से गुजर रहा है, आए दिन माॅब लींचिंग की घटनाऐं उदाहरण अभी का बेगुसराय, संतोष झा की कोर्ट में हत्या, महिलाओं को निर्वस्त कर सरे बाजार घुमा देना, डाक्टरों से रंगदारी मांगने की घटनाऐं, राजधानी में करोबारियों की हत्याऐं, हाजीपुर में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेताओं की हत्याऐं, विश्विद्यालयों के कर्मीयों को रंगदाड़ी न देने के एवज सड़क पर मार दिया जाना, हाल ही में हुए बक्सर में दंपति पर हमला और पत्नी का अपहरण, 2010 के बाद बिहार के अपराधियों के मूल में रहे गिरिराज सिंह का उदय हो जाना आम सी बात होकर रह गई है। इन घटनाओं ने जहाँ एक तरफ बिहार की छवि को खराब किया है वहीं दूसरी तरफ बिहार की जनता अब डर के माहौल में जिन्दगी व्यतीत करने पर विवश नजर आ रही है।
बिहार अपराधियों के लिए स्वर्ग हो चुका है, यहाँ आज भी सुशासन बाबू की मानें तो बिहार में ‘‘आल इज वेल’’ है। भाजपा के कद्दावर नेता प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री अपराधियों के सामने प्रेस काॅन्फ्रेंस के माध्यम से बौद्ध दर्शन समझा रहे हैं। अच्छी बात है आॅल इंडिया मुस्लिम बेदारी कारवाँ सुशील कुमार मोदी के इस पहल की सराहना करता है साथ ही साथ यह भी सवाल पूछना चाहता है कि बौद्ध की इस धरती को नाथूराम गौडसे की धरती बनाने का काम किसने किया है? माननीय उप-मुख्यमंत्री जी जब यही घटनाऐं राजद गठबंधन में हो रही थी तो आप उसे जंगलराज-2 की वापसी मान रहे थे और आज नीतीश के भाजपा में वापस लौटने के बाद बिहार अपने शर्मनाक दौर से गुजर रहा है तो किया यही राम राज्य है, जिसकी चर्चाऐं दिल को सुकुन दिया करती थीं? जिस प्रदेश का एडीजी ही सरकार का खुलेआम दलाल हो जाए उस प्रदेश की कानून व्यवस्था और पुलिसिया प्रशासन की बेबसी देखी जा सकती है और यह बेबसी तब और खतरनाक साबित हुई जब बेगुसराय में भीड़ ने तीन लोगों को पुलिस जत्थे के सामने लाठीयों से पीट पीट कर मार डाला, पुलिस प्रशासन तमाशाई बनी रही!
बिहार की हालत बद से बदतर होती जा रही है। सुशासन पूरी तरह पस्त हो चुका है और अपराधी मस्त। हुकुमत से लेकर पुलिस चैकी तक दबाव में है।
जनता डरी व सहमी नजर आ रही है। एक खास विचार धारा के सिवा सारी विचारधाराऐं देश समेत प्रदेश में भी धाराशाही हो चुकी है। अब ना नीतीश की अन्तरात्मा जागती है और ना ही सुशील कुमार मोदी को जंगलराज का भय मालूम पड़ता है। बिहार जो नीतीश कुमार के नये बिहार स्लोगन के साथ उभरा था अब वो बीमार हो चुका है। प्रदेश एक नया मुख्यमंत्री तलाश रहा है। विकास के सारे काम जो नीतीश कुमार के साथ जुड़े थे अब अपनी मौत आप मर रहे हैं। हर तरफ हताशा और निराशा है। जनता सरकार और प्रशासन से उम्मीद छोड़ चुकी है। हजारों गाँव आज भी ऐसे हैं प्रदेश में कि अगर थोड़ी बारिश हो जाए तो पैदल चलना तक ठप हो जाता है। जनता विधायकों से मिलती है उच्च स्तरीय पदाधिकारियों से मिलती है मगर कुछ नहीं, हताशा और निराशा!
बिहार विकास की तलाश में है, जनता को भी आने वाले चुनावों में सुझ बूझ का परिचय देना होगा, ऐसा न हो विकल्प की तलाश में हम एक बार फिर अपराधियों के संरक्षक को ही प्रदेश का सेवक बना डालें।
लेखक:-
नजरे आलम
राष्ट्रीय अध्यक्ष
ऑल इंडिया मुस्लिम बेदारी कारवाँ
मो0- 7004061602